शनिवार, 8 अगस्त 2009

आबरू

एक सुबह आबरू को सड़क पर पड़े देखा ,
देखा उसे पीठ के लेटे साँस रहित मरी सी
मरी सी पर जीवीत थी आबरू बनकर
आबरू जो लुट पीट चुक थी द्रीदों के हाथो
उन हाथो से जो अपने घर की आबरू को बचाते
बचा के रखते है उसे घरो में बैठको में सजाते
सजा के रखते उसे जो गरीबो असहायों की नही
नही है महानगरो में अकेली लडकी की
उस लडकी की जो देर शाम नीक्लने डरती है
डरती है वह उस घटना जो मार न दे उसकी आबरू को

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