शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

माँ की भूमिका

माँ की भूमिका तो सैदव ही महत्वपूर्ण रही है परन्तु अंधाधुध विकास एवं ग्लोबलाईजेसन की प्रकिया के बाद समाज का ढांचाबदला है.उसके बाद परिवारों का बिखरना,परिवेश में परिवर्तन व्  मनुष्य   के आत्मकेन्द्रित होने से मानव के जीवन में माँ कीभूमिका निःसंदेह पहले से बढ़ी है.आज से कुछ समय पहले जब समाज में संयुक्त परिवार वर्तमान की अपेक्षा अधिक होते थेतथा मनुष्य वर्तमान की भांति स्वकेंद्रित नहीं था तब एक बच्चे के चारो तरफ अनेको रिश्ते होते थे.उसे ममता, स्नेह और दुलार न केवल माँ से ही नहीं बल्कि अन्य रिश्तो जैसे बुआ,नानी,चाची,दादी,मामी से भी मिलता था.परंतु आज जब संयुक्तपरिवार टूटे रहे है तो माँ की भूमिका और उसके कर्तव्य भी पहले से अधिक बढ़ गए है क्यूकि परिवार की अकेली संतान केलिए कभी वह मित्र, कभी बुआ,कभी चाची और कभी दादी बनकर लोरिया एवं  कहानिया सुनाती थी.परन्तु जब बच्चा अपनीदादी और नानी के बुजुर्ग हाथो से प्यार, दुलार नहीं पाता तो उसे ये सब कुछ माँ से ही मिलता है.इसलिए माँ की भूमिका निःसंदेहमहत्वपूर्ण हो गई है.आज के परिवेश में यदि माँ का सहयोगात्मक रवैया न हो तो बच्चे का सम्पूर्ण विकास मुश्किल है.यही नहींकिशोरअवस्था में उसके बढते कदमो के साथ उसकी निगरानी भी केवल माँ ही कर सकती है

3 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय प्रज्ञा पाण्डेय जी,
नमस्कार !
मां की सूरत के अलावा भगवान की सूरत क्या होगी
मा की महानता के बारे में जितना कहा जाए उतना कम है जहां भी आदर और महानता का जिक्र करना होता है | वंहा मा शब्द जरूर आता है

babanpandey ने कहा…

माँ की भूमिका को कौन नकार सकता है प्रज्ञा जी /

Dinesh pareek ने कहा…

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
http://vangaydinesh.blogspot.com/
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