गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

बाजार

चमचमाती दुकाने
ग्राहकों को लुभाते दुकानदार
चौतरफा रोशनी ही रोशनी है ......
जगमग सड़के ......
दुकाने जो बेच रही है,
जीते जागते इन्सान को ,
इन्सान, हाड़ मांस का मानव
उसका अपना खून,
दुकानदार है लड्केवाला ,
और खरीदार है लडकीवाला,
लड़की का पिता बाजार में सोचता है .......
अपनी हैसियत के बारे में ...
हैसियत उसकी कम है तो,
वह कैसे ? कैसे ?अपनी लड़की
के लिए खुशिया खरीदेगा !
लड़की जो देख रही है सब कुछ ,
कुछ कह नहीं सकती ,
पिता की मजबूरी को देख,
आँखों में आंसू आते है !
रोती है अपने लड़की होने पर ,
लेकिन क्या करे ?
उसके हाथ बंधे है पिता की इज्जत से,
पिता,समाज में क्या कहेगे ?
माँ की आशाए,
उसे विदा करने की,
उसका क्या होगा ?
इसलिए ये बाजार लगा ही रहेगा ......

8 टिप्‍पणियां:

देवेश प्रताप ने कहा…

बहुत मार्मिक रचना ......आज का ये युग देख कर वाकई दुःख होता है ......दहेज कि प्रक्रिया को बहुत मार्मिकता से आपने लिखा है .

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत मार्मिक कविता।

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत मार्मिक कविता।

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

दिलीप ने कहा…

bahut marmik sir...rishte naate usool sab bazaron me bikte hain...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

divyanshu ने कहा…

जिंदगी के बाजार में सब कुछ बिकता है।लोग अपने और अपनों को बेच रहे है।इस बाजार का भी वही फंडा है कि आप अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग एडवर्टाइजिंग और मार्केटिंग कितने अच्छे से करते हैं।लोग अपने को ही बेच कर खुश होते हैं।अपना आत्मा अपनी जमीर को तो बेचा जा सकता है और बेचा भी जा रहा है पर क्या यहां प्यार किसी मोल मिल सकता है?
यह हमारे हाथ में ही है कि हम इस बाजार में नीलामी पर चढ़ते हैं या इस बाजार को ही बंद कर देते हैं।
संवेदनाओं को जगाने और बनाए रखने के लिए बधाई।

Nirmal Kumar Pandey ने कहा…

बड़ी ख़ूबसूरती से बयां किया है आपने प्रज्ञा.
अज्ञेय के शब्द अगर उधार लूँ तो कहूँगा कि ----

है राह
कुहासे तक ही नहीं, पार देहरी के.
है.................
मै हूँ तो वह भी है.

dinesh ने कहा…

आपकी कोशिश काबिलेतारीफ है

varun jha ने कहा…

चमचमाती दुकाने
ग्राहकों को लुभाते दुकानदार