शनिवार, 8 मई 2010

मेरा मन

मेरा मन
वह मन जो भीतर है मेरे,
सोचती हूँ , मै नहीं हूँ ........
केवल मेरा मन है ........
वही मन जो कहता है मुझसे,
बोलता है मन मेरा
कर वही जो मै कहता हूँ,
आह ! काश मै कर पाती,
सुन पाती उसकी इच्छाओ को,
कैसे समझाउं उसे ........
मन,.... मेरा मन
दुखी,उदास ,हतास और निराश है .
क्या करूँ ?
उसे कैसे मनाऊँ ?
मनाऊँ भी तो कैसे ?
मेरे तर्कों को नहीं सुनता है ,
कहता है ! तुम यंत्र मत बनो ....
उसे कैसे समझाऊँ ?
यह दुनिया तो एक मशीन है ,
और मशीनी भाषा समझती है,
कैसे समझेगी ?मेरे मनोभावों को .....
मेरा मन शांत हो जाता है ,
यह सुनकर .......
और मै पहले से भी ज्यादा बेचैन,
बेचैन और निरुतरित,
क्यूंकि फिर मेरा मन उदास है !

(फोटो http://fineartamerica.com/featured/nostalgia-mirjana-gotovac.html से साभार )

7 टिप्‍पणियां:

श्यामल सुमन ने कहा…

सुन्दर भाव की रचना प्रज्ञा जी। वर्तमान हालात में खूब परिभाषित किया है आपने मन को। संस्कृत में कहीं एक उक्ति देखा था - मनः एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

nilesh mathur ने कहा…

आज आपकी कई रचनाएँ पढ़ी, आपकी रचनाओं में एक अलग अंदाज है, पढ़कर अच्छा लगा!

अमिताभ मीत ने कहा…

अच्छा है ....

वन्दना ने कहा…

man ko bahut sundar dhang se paribhashit kiya hai.

दिलीप ने कहा…

sach kaha ye duniya to machine hai wo kya samjhegi...

बेनामी ने कहा…

Ati Prasaneey bhav se Mann ko pesh kiya gaya hai.Is bhagam bhag se aam adami ko mann ke baare mein soch pa raha hai. Bas machine ki tarah laga pada hai.

Yours

संजय भास्कर ने कहा…

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।