रविवार, 9 मई 2010

मदर्स डे

आज मदर्स डे है .चारो तरफ गहमागहमी है बाजार में तरह तरह के तोहफों से दुकाने सजी है .लोग इस अवसर को अपनी इच्छा अनुसार मना भी रहे है .........खैर इसके  इतिहास तथा इसे मनाने के औचित्य तथा अनौचित्य पर न जाकर देश में माँ की दशा पर गौर करे तो ज्यादा बेहतर होगा ..............
                                        आजादी के लगभग साठ बरसों बाद भी भारत में स्वास्थ्य सुविधाओ की दशा ठीक नहीं है यह बात छुपी नहीं है .शहर हो या गाँव अस्पतालों के नाम पर कुछ ही जगहे मिलेगी .और उनमे भी हर मरीज अपनी बारी का इंतजार करता हुआ असहाय दिखाई देगा.इसके अलावा जब बात हम अपनी  आधी आबादी की करते है तो उसे ये भी नसीब नहीं होता.
क्यूंकि वह तो औरत है और उसका धर्म है दर्द सहना ,पिसना और चुप रहना.
                                                           इन्ही कारणों से भारत में मातृव मृत्यु दर कम नहीं हो रही है .देश में प्रसव के दौरान महिलाओ की मृत्यु दर काफी ऊँची है .भारत में माता मृत्यु अनुपात १००,००० प्रसव पर २५४ है .केरल में यह ९५ है तो असम में ४८० है.यह इस महाद्वीप का सबसे ख़राब अनुपात है, बांग्लादेश व् पाकिस्तान से भी ख़राब. इसे और आसानी से समझना हो तो ऐसे जान लीजिये कि भारत में हर साल ६५,०००० महिलाये प्रसव के दौरान दम तोडती है .यानि हर आठवे मिनट में बच्चे को जन्म देते समय एक महिला की मौत हो जाती है .
                                                                             इनमे से ५०% मौते रक्त स्राव और संक्रमण के कारण  होती है . अफ़सोस जंक तथ्य यह है कि भारत में आधे प्रसवो में कोई स्वास्थ्यकर्मी मौजूद नहीं होता. ये तथ्य औरत का जीवन कितने संकट में है इसकी भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है .माँ की मौत के बाद शिशु के मरने सम्भावना बढ़ जाती है .और अगर शिशु बच भी जाए तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्य्थ हो उसकी सम्भावनाये बहुत कम होती है .
                                                                     प्रसव के दौरान किसी स्त्री की मौत न केवल परिवार के विपदा होती है बल्कि यह एक सामाजिक समस्या बन उभरती है .माँ की मौत से पिता के ऊपर जिम्मेदारी बढती है और इससे  पूरा परिवार प्रभावित हो समाज पर भी असर डालता है .
                                                       यह तो बात हुई प्रसव के दौरान काल के गल में जाने वाली माओ की. अब उनकी बात करते है जो अपनी कोख किराये पर देती है जी हाँ यहाँ बात हो रही है सैरोगेट मदर की .वह माँ जो अपने बच्चे को नौ महीने
पेट में रख तमाम तकलीफे उठाती है और फिर अपने कलेजे के टुकड़े को किसी और को सौपती है न जाने इसके पीछे उसकी क्या मज़बूरी होती है .यहा उसका दैहिक और मानसिक दोनों शोषण होता है .लेकिन हमारे देश इसके लिए उचित कानून का अभाव है जो आवश्यकता पड़ने पर उसे इंसाफ दिला सके ....................
                                                        तो क्या तथाकथित मदर्स डे पर इन अभागन के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है ?क्या उन्हें उनका अधिकार नहीं मिलना चाहिए ? इस अवसर इनकी बात हो तभी देश का हर बचा खुश हो मदर्स डे मना पायेगा ..............

8 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

आपने एक कड़वी सच्चाई कही है..पर दुर्भाग्य है इस भारत देश का जहाँ बहुत कम लोग इस उस विषय के बारे में सोचते है जहाँ देश और समाज का भला हो...बहुत अच्छी बात कही आपने जब लोग समझ ले तो और भी सार्थक हो जाए..

nilesh mathur ने कहा…

सच कहा आपने, कहीं ना कहीं हम सभी दोषी हैं इसके लिए, हम सिर्फ प्रशंशा बतोराने के लिए अच्छा लिख सकते हैं, लेकिन यथार्थ के धरातल पर हमारे पैर टिकते नहीं!

boletobindas ने कहा…

देश के अधिकांश हिस्मे में महिलाएं ही आर्थिक धूरी हैं..बावजूद इसके उसे पूरी तरह कुपोषित होती हैं..आने वाली नस्ल के सेहत की बात इन हालात में सोचना बेकार है....सवाल वही है कि कब बदलने की कोशिश करेंगे..पुरानी स्वास्थय व्यवस्था को हजारो साल पहले तोड़ दिया गया....नया इन्फ्रास्टकचर दिल्ली में ही दुरस्त नहीं है तो बाकी देश का क्या कहने...

बेनामी ने कहा…

It is very nice topic on the mother day. If you give your money to the NGO or help any mother instead of the giving gift to own mother. Your voice like youth citizen Also many of people have no knowledge of "why the mother day celebrated" instead of they celebrate.

देवेश प्रताप ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने .....ये दशा कब सुधरेगी भारत कि

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

vikas ने कहा…

आज भी खूब नाबालिक शादियाँ हो रही हैं,लोगों में जागरूकता नहीं है,और इसका सबसे बड़ा कारण शिक्षा का आभाव है.सही समय पर सही आकड़ा अपने बताया,,,आभार

विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com

बेनामी ने कहा…

If the girl is very less in India then we have only one option to opt the other culture because our mother and wife are from other culture within few generations. In this way we loose our diamond culture.So please save my golden Indian Culture.It is my humble request. There is no difference between girl and boy because first thing they are human not animals.