सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

बोझ

मिट्टी भरा तसला सिर पर
लिए  खड़ी है वह
भाव विहीन चेहरा..........
गहरी आंखे जिनमे न जाने
क्या छिपा रही है.............
उसने, जो सृष्टी को
रचने वाली है ,पत्थर
के घर बनाने कि ठानी है,
उसका अंश जो धूल धूसरित
है ,उसे आँखों से ओझल
कैसे करे ,उसे और अपने
को एक डोर से बाँधने
के लिए ही तो उठा  रही है
यह बोझ ..............

7 टिप्‍पणियां:

विचारों का दर्पण ने कहा…

बहुत बढ़िया कविता ..मेहनत और आशा की झलक है इसमें

संजय भास्कर ने कहा…

आपकी रचना कहीं ना कहीं बहुत भीतर तक छू गयी ।

संजय भास्कर ने कहा…

WAH...........BEHTEEN PRASTUTI

Ravi Rajbhar ने कहा…

Bahut khub...tarif ko shabd nahi..aap bahut achchha likhtin hain...badhai

R.K.Sharma ने कहा…

लिखने के लिये बहुत कुछ है ।परन्तु छाया चित्र ने अनेक के सामने प्रश्न खडे किये है देश के नेता इस सत्य से अनजान है कार्य करते रहें

meri najar mei ने कहा…

bahut achhe.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत खूब, लाजबाब !