सोमवार, 25 जनवरी 2010

लडकियों का दिन


लडकियों का भी एक दिन होना चाहिए क्यूंकि हर किसी का एक दिन होता है ..........जी हा यह बात एक निम्न वर्ग की अधेड़ महिला ने कहा ......यह पूछने पर की सरकार ने साल में एक दिन लडकियों के लिए रखा है उसे इसके बारे में पता है. उसे ही क्या लगभग नब्बे प्रतिशत  पढ़े लिखे लोग इस बात से अनभिज्ञ थे की 24 जनवरी को रास्ट्रीय बालिका दिवस है .उस दिन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा दिए गए विज्ञापन में गलती के कारण हुए बवाल की चर्चा न ही करे तो बेहतर होगा ...................
                            आइए हम दूसरी बातो  पर न विचार  करते हुए उस नन्ही दुनिया में चलते है जो अपने अस्तित्व के लिए निरंतर संघर्ष कर रही है उसका संघर्ष अपने को जीवित रखने से लेकर दुनिया में नाम कमाने तक है ....................
                                                   आज आजादी के बाद विकास की अच्छी तस्वीर सामने आई है.अच्छे संभ्रांत परिवारों में सभी बेटे की इच्छा व्यक्त करते है बेटी की नहीं, जी हाँ यह एक सच है जो केवल चारदीवारी के भीतर होता है उसे बाहर आने की अनुमति नहीं होती है,हो भी क्यों न यह उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर वार जो करती  है............................
                                            लोगो की इसी मानसिकता ने भारत में लिंगानुपात की यह दुर्दशा की है. लिंगानुपात की इस स्थिति से  न जाने कितने अपराध जन्म लेंगे इसका अंदाजा लगाना जरा मुश्किल है. यह अपराध औरतो के प्रति हिंसा से लेकर अंपने बेटे के लिए बहू खरीदने तक है .........जरा सोचिये तो अगर देश में लडकिया नहीं होगी तो स्थिति क्या होगी, किसे आप धर्मपत्नी बनायेगे, किसके साथ अपना सुख दुःख बाटेगे,कौन आपको राखी बाधेगी,किसकी तोतली बोली पर आप रिझेगे सोचिये ...........................
                                                  अब वक्त आ गया है क़ि हम सब मिलकर इसके लिए कदम उठाये ,इसके बारे में सोचे क्यूकि इसकी बिना भविष्य सुखद नहीं होगा ................................

2 टिप्‍पणियां:

meri najar mei ने कहा…

Good, it's a relevant issue which u have raised.we all should think about it.

sudha singh ने कहा…

बढ़िया ब्लॉग है प्रज्ञा। जरूरी सवाल उठाएं हैं तुमने। ऐसे ही लिखती रहो।